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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

कपिल देवहूति संवाद प्रसंग Kapila–Devahuti Dialogue | Teachings on Sankhya Yoga and Devotion

कपिल देवहूति संवाद प्रसंग Kapila–Devahuti Dialogue | Teachings on Sankhya Yoga and Devotion

कपिल देवहूति संवाद प्रसंग Kapila–Devahuti Dialogue | Teachings on Sankhya Yoga and Devotion


ब्रह्मा से पाकर सन्तानोत्पत्ति का आदेश
दशसहस्रवर्ष करी तपस्या
कर्दम मुनि अति विशेष
सत् युग में प्रसन्न हो प्रभु ने
दिव्य दर्शन दिखलाए
किरीट कुण्डल शंख गदाधर
पीताम्बरी पहन कर आए

पुलकित हो बोले मुनि ध्यानी
जन्मजन्मान्तर की तृषा तुम जानी
तारनहार तुम सदा सुजान
लोभी तुच्छ सब एक समान

( ये मायया ते हतमेधसस्त्वत्-
पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम्।
उपासते कामलवाय तेषां
रासीश कामान्निरयेऽपि ये स्यु:( ३/२१/१४)

अपनी कामना रखी समक्ष ,
देख प्रभु अनुकूल
ऐसी कन्या से प्रणय सम्बन्ध हो
सुशील गृहधेनु व्रती नि: शूल
श्रीभगवन् कहने लगे ,
सुनो हे भक्ति वृन्द
आश तुम्हारी जानकर
कर दिए सब प्रबन्ध

जो कोई ध्याये मुझे
छोड़ अन्य की आश
सर्वस्व समर्पित जो करे
नहीं किसी विधि रहे निराश

( न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम्।
भवद्विधेष्वतितरां मयि संगृभितात्मनाम्॥ ( ३/२१/२४)

मनु शतरूपा आएँगे ले कन्या प्रस्ताव
परम सुशीला चरित्र संपन्न
योग्या सेवा व्रत धारिणी
जप तप यजन निष्पाप


आदेश पालन जब कर लोगे
मम इच्छा अनुरूप
प्राप्त करोगे स्वच्छ हृदय
साक्षात् मम स्वरूप
नव कन्या सह आऊँगा
बन देवहूति का अंश
दर्शन सांख्य बताऊंगा
माँ से परे करूँगा यम दंश

यथा काल आए मनु राजन
ले पुत्री को साथ
अपनी श्रेष्ठा राजकन्या
का बनाने ब्राह्मण को नाथ

शील , विद्यारूप वय देख मुनि के पास
कन्या अर्पित करते हैं राजन् पूरण आस
संपत्ति नश्वर है , नष्ट न हो संस्कार
यही विचार धर विवाहसूत्र को लाए हैं महाराज
ऋषि कर्दम ने सहर्ष स्वीकार किया प्रस्ताव
परन्तु रखी उपधा एक , बिना ही कोई दुराव
जिस पल वीर्य धारण कर लेगी सुधि शृंगार
भक्ति योग ग्रहण करूँगा छोड़ जगत् के चाव

अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं
यावत्तेजो विभृयादात्मनो मे ।
अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान्
शुक्लप्रोक्त्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान्॥ ( ३/२२/१९)

मुनि की निर्मल भक्त्ति से
आकृष्ट देवहूति होई
जितनी सेवा कर सके
प्रतिदिन करती सोई

एक दिन संकोच से स्मरण कराये वचन
मुनि हो प्रसन्न आए देख कृश वदन
येगमाया से लौटा दिये सारे सौन्दर्य धाम
काम कार्य में व्यस्त हुए युगल जो थे निष्काम

(शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषा:।
भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम्॥ ( ३/२२/३७)

नवकन्या को जन्म दिया शीघ्र देवहूति प्रासूत
परम सुन्दरी कमल सम गंधी जिनमें विशेष
जाने को उद्यत दिखे जैसे ही मुनिनाथ
हाथ जोड़कर बोल उठी मानीनि कहे सुरेश

कन्या स्वयंवर ढूँढकर चली जाएँगी छोड़
उस समय कौन मिटाएगा मेरे सारे शोक
मैं माया से ठगी हुई भौतिक बन्धन आसक्त्त
कौन मेरे अज्ञान को हटाए करे विशोक

( साहं भगवतो नूनं वंचिता मायया दृढ़म्।
यत्त्वा विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात्॥ ( ३/२३/५७)

दे संदेश दम नियम तप
चले गए मुनि भक्त्ति के द्वारे
पूजित हो तुमसे स्त्री साधक
शीघ्र पुत्र बन आएँगे श्री हरि तुम्हारे

( स त्वयाराधित: शक्लो वितन्वमामकं यश: ।
छेत्ता ते हृदयग्रन्थिमौदर्यो ब्रह्मभावन: ॥ ( ३/२४/४)

जब चले श्री मुनि वन को करने विहार
भगवान् कपिल रहे मात संग करने उनका उद्धार
माता ने इच्छा की हे नाथ! छुड़ाओ बन्ध
साक्षात्कार का अवसर दो यद्यपि मैं सम अन्ध
कपिल देवहूति संवाद का सार है यह अल्प
१. मन बन्धन का कारण है मन ही देत संकल्प

( चेत: खल्वस्य बन्धाय मुक्त्तये चात्मनो मचने
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्त्तये ॥ ( ३/२५/१५)

२. भक्त्ति की महिमा ही होती अपरम्पार
योग, ध्यान स्वाध्याय , तप त्याग न करो विचार

( न युद्यमानया भक्त्या भगवत्यखिलात्मनि।
सदृशोऽस्ति शिव: पन्था योगिनां ब्रह्मसिद्धये॥ (३/२५/१९)

३. सच्चा साधु है वही जिसमें करुणा शील

(तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम्।
अजातशत्रव: शान्ता: साधव: साधुभूषणा: ( ३/२५/२१)

४। नाम ही तारे भव का सागर
नाम ही जीवन का उत्तुंग प्राचीर

( यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद्
यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्।
श्वादोऽपि सद्य: सवनाय कल्पते
कुत: पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ (३/३३/६)

इस प्रकार हो गया कपिल देवहूति प्रसंग समाप्त
स्मरण रहें यह सब उपदेश जो हैं परम ही आप्त

हरे कृष्ण !!
निशि !

कपिल देवहूति संवाद प्रसंग Kapila–Devahuti Dialogue | Teachings on Sankhya Yoga and Devotion